चला गया।

बंद मुट्ठी में भी कुछ रह नहीं पाया;
रेत-सा था सबकुछ, बस फिसलता चला गया।।

मेरे लिए भी कितनो ने अपना वक्त जाया;
और मेरा गुरुर उनसे बस मुकरता चला गया।।

भाग के गैरों से जो मैं अपनों के पास आई;
तो मेरे पीछे चलता हुआ काफिला भी मुझसे बिछड़ता चला गया।।

लेखाजोखा नहीं है कि क्या खोया और क्या पाया;
बस हासिल जो किया था वो सब अब धुएँ-सा उड़ता चला गया।।

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Wow :anguished::heart:

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gazab :heart_eyes::heart_eyes::heart_eyes:
bahut khoob dost @Rupa_dey

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