भूखमरी की आवाज़ ...।"(the voice of starvation)

अमीरज़ादे गरीबों की कुटिया में कहाँ आते हैं ,
यह तो बातों के शेर हैं ,बस बातें ही बनाते हैं ।

मेरी आगोश में तू आ ,तो फ़कीरी क्या है, मैं बताऊँ ,
भूख़ बर्दाश्त कर ,तो भुखमरी का चेहरा भी दिखाऊँ ।

वह कचरे की पेटी से खाना खाते और खिलातें हैं ,
अपनी मजबूरियों का ,वह इस तरह खिल्ली उड़ाते हैं ।

अधनंगा सा भिक्षु बन ,तो भिखमंगा कौन,मैं बताऊँ ,
फटे पोशाक तू पहन,तो कपड़ों की क़ीमत भी समझाऊँ ।

दरबदर भटक कर ,वह ग़रीबी की आह सुनातें हैं ,
अभावों की दुःखद दास्ताँ , हाड़ पिंजर बतलातें हैं ।

जो भाषण देते हैं गरीबी पर,उनसे भीख ,मैं मंगवाऊँ ,
अपने वादों से जो मुकरते हैं ,उन्हें सूली पर ,मैं चढ़वाऊँ ।

शर्म तो उनपर आता है, जो गरीबों का हक़ खातें हैं ,
दूसरों के पेट पर लात मारकर, अपना घर चलातें हैं ।

यह हुंकार है भुखमरों का,इसकी प्रवाह में ,सबको बहाऊँ ,
वर्ग संघर्ष की बात है यह , समाज को ज़रा याद दिलाऊँ ।

गरीबों का देश है अपना, ग़रीबी में हम पलते हैं ,
कुछ घर ऐसे भी हैं ,जहाँ मुक़द्दर से चूल्हे जलते हैं ।

आज इस मतलबी दुनियाँ में एक जागृति ,मैं जगाऊँ ,
दान करना मेरी संस्कृति है,नए युग को परोपकार सिखाऊँ ।

               -  शाहीर रफ़ी
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Well very said and a very sensitive topic kept forward.
I hope to see a revolutionary change someday with poetry.

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amazing interesting post friend :slightly_smiling_face:

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