इदारा-ए-इश्क़ (the institution of Love)

वह तो मुहब्बत का इदारा खोल के बैठी है ,
ख़ुद को नावज़ीशों के तराज़ू में तोल के बैठी है ।

बेफिज़ूल सा हर वक़्त ,हँसता रहता हूँ ,
क्योंकि हँसमुख रहना ,ऐसा वह बोल के बैठी है ।

   - शाहीर रफ़ी

किसी साहिब-ए-जमाल के हुस्न का अंजाम और समापन यह है कि देखने वाले उसे हूर -ओ- मलाईका से तुलना करने लगते हैं । लेकिन मैं उसे एक शहज़ादी का ख़िताब देता हूँ ,जो तराज़ू-ए-वफ़ा पर बैठ नवाज़ीशों के बेमिसाल दौलत से तोली जा रही है । अब मेरा तसव्वुर देखिए कितना प्यारा है ,की मैं उसे इश्क़ में लालची न कहकर उसे आलिम-ए-इश्क़ कहता हूँ ,जो मुहब्बत का इदारा खोल के बैठी है ।और उसने मेरी मुस्कान को बरक़रार रखने को जब कहा ,तो महबूब की याद में कुछ ऐसा आलम हुआ ,के बेमतलब,बेफिज़ूल,हम हँसने लगे ।इश्क़ की जुनूनीयत ऐसी होती है साहब,जो क़ैस जैसे आम इंसान को मजनू बना देती है ।

Word meanings :
इदारा - institution

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Wah wah wah

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