निदा-ए-शाहीरी (The call of Shaheer)

कहने को तो हज़ारों अफ़साने हैं ,
लेकिन कोई मेरी बात सुने तो, मैं कहूँ ।
यहाँ बातों का कोई मोल नहीं ,
बेहतर यही होगा के मैं ख़ामोश रहूँ ।

यह जमात है , गोस्त और खून के पुतलों का ,
सोचता हूँ ,इन जैसा पत्थर मैं भी बनूँ ।
फिर निग़ाह टूटी कलम पर पड़ती है ,
मेरी ग़ज़ल फिर मुझ ही से लड़ती है ।
और कोरे कागज़ के ढेर से यूँही ,
एक शहर-ए-सब्ज़ का फरमान निकलता है ।
निदा-ए-शाहीरी से लबरेज़ ,
नकशों और कविताओं का मीज़ान निकलता है ।
सूद-ए-फ़रामोशी का हवाला देकर ,
तवारीख़-ए-सुख़न मुझसे सवाल यूँ करता है ।
आराइश-ए-अफ़कार आख़िर ,
मेरे जबीन के ताजपोशी के लिए मचलता है ।
जब इतने सारे मेराज हैं तरक़्क़ी पाने के लिए ,
तो फिर गिरने का खौफ़ क्यों दिल में रखूँ ।

  • शाहीर रफ़ी

Word meanings :
शहर-ए-सब्ज़ - The green city
निदा-ए-शाहीरी -the call of Shaheer, clarion call .
नकशों (from नक़्शा) - here it means sketches of monuments and sculptures , Don’t interpret it with maps .
सूद-ए-फ़रामोशी - एहसान फ़रामोशी ,the blame of treachery .
तवारीख़-ए-सुख़न - history of poetry
मीज़ान - summation/total
आराइश-ए-अफ़कार - adornment of thoughts
जबीन - forehead
ताजपोशी - corronation ceremony
मेराज - सीढ़ी /ladder/ऊपर चढ़ने के लिए व्यवस्था

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Such a message delivering work.

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