Mukaam ! मुकाम!

मुकाम ! Mukaam !

डूबे हैं इश्क़ के कानून में,
कुछ मुकाम हासिल करने में ,
कायम कुछ ज़माना था ,
वक़्त के इस दामन में …

की बातें बहुत सी करनी हैं,
हमको तुमसे ,
लेकिन क्या करें ,
बैठे रहते है दिन भर,
अखबार लिए तुम्हारी यादों में,

दिल बहक जाता है आज कल मेरा,
इन एहसान फरामोश की बातों में,
जज़्बात मेरे बिखरे हैं,
सिर्फ तुम्हारी ही यादों में,

अब तो रविवार भी बीत जाता है,
बस तुम्हारी ही चाहत में,
तुम याद बहोत आते हो ,
मुझे ! मेरे ही जज़्बातों में,

फितरत मेरी बहकी है ,
तुम्हारी ही मस्त बातों में,
अब तो !
झलक तुम्हारी दिख जाती है,
इन सहमी सुकूड़ी रातों में,

ठिठुर ठिठुर के बैठे है हम,
अब चय का कप है !
मेरे हाथों में,
याद तुम्हारी तड़पाती है अब ,
जब सुनते है बातें लोगों की ,
इस नए नवेले ज़माने से ,

तुम बस मेरी आदत हो ,
मुकाम हासिल कुछ करने की,
एक बात मेरे ज़हन में है,
लिखूँ दूं तुमको लफ़्ज़ों में,
लिखावट मेरी कुछ पनप रही,
अब तुम्हे हाँसिल करने में ,

डूबे हैं इश्क़ के कानून में,
कुछ मुकाम हासिल करने में ,
कायम कुछ ज़माना था ,
वक़्त के इस दामन में …

जुपिटर

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5 Star Work!

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Bahut shukriya sir :bouquet::bouquet::bouquet::bouquet:
Ise bhi agli book mein submit kar lijiyega

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:slightly_smiling_face: haan zaroor

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