Kitabi bate

लिख दू उन कोरे कागज़ो पे खुद के किस्से
जो खुदा ने लिखे थे मेरे हिस्से
कुछ मे थे अजनबियो के चर्चे
तो कुछ मे हुए अपनो के चर्चे
कुछ नाम हुए खुशी मे
तो कुछ तब्दील हुए गम में
लोग बिछड़ते रहे जैसे
दिन होते हैं बिछड़
तो कुछ साथ रहे जैसे
सांसें होती है हरदम संग
महफिल भी सजी काफ़ी
चार कंधों तो चार पिए वाली गाड़ी में चली
हिस्से मे कुछ घूंघट की आड़ मे चली
तो कुछ घुंघट को जिस्म से लेप्त्ते चली
लिख दू उन कोरे कागज़ पे खुद के किस्से
जो खुदा ने लिखे थे मेरे हिस्से
सोचती ब्या करू क्या उनको अपने लफ्जों से
या अल्फाज़ौ को वो सुनहरा मोका दू
लिख के उन हज़ार किताबों मे…

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Beautifully penned. :black_heart:

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Well penned :blush::ok_hand:

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