Ghar dwaar

ज़िन्दगी की राह में चलते चलते आज भी मैं एक आगाज़ किया करता हूँ ,
आज भी वही पल मेरी आँखों के सामने आ जाते है,
जब भी मैं अपने घर के द्वार को याद किया करता हूँ ,

मेरे वही गुलाबी ख्यालात फरबरी वाले
और
बसंत जज़्बात गुलाबी गालों वाले , फिर एक फरियाद मुतासिर करके अपने घर की दहलीज़ को किसी कागज़ पे उतारा करता हूँ ,
आज भी मैं चलते चलते एक आगाज़ किया करता हूँ,
की मैं अपने घर को आज भी याद किया करता हूँ ,

लोगों का कुछ कहना …
मैं कभी अनसुना किया नही करता हूँ ,
वो कहते है कि मुस्कान बड़ी कीमती होती है , वो कीमत चुकाने के लिए मैं आज भी अपने घर को याद करके थोड़ा मुस्कुरा लिया करता हूँ ,
जब भी घर की ओर बढ़ता हूँ तो अपनी ही धुन में खो जाया करता हूँ , फिर हद किस हद तक बढ़ जाये , उसकी चिंता मैं बेफिक्र हो कर उड़ाया करता हूँ ,

फिर जैसे ही दूरियाँ बढ़ती हैं ठीक वैसे ही मैं फिर से अपने घर से दूर हो जाया करता हूँ ,
लाज़मी है कि …
फिर मैं अपनो का नही , गैरों का हो जाया करता हूँ ,

फिर एक बार दूरियों को देख कर मुसाफिर बन जाया करता हूँ , इत्तेफाक़ और कुछ इंसानियत देख मैं लोगों के अंदर अपने घर के सदस्यों की हर एक बात को याद किया करता हूँ ,

की एग्ज़ाम की फिक्र रहती है मुझको , अंततः उस एग्ज़ाम की आखिरी तारीख में …
मैं अपने घर का टिकट
जँगगमवाणी से फरमाया करता हूँ ,

दूरियाँ बहुत हैं लेकिन मैं फिर भी मुस्कुराया करता हूँ ,

जो मुकम्मल मुकाम हाँसिल होते नही ,
उस मुकाम को मैं हाँसिल किया करता हूँ ,
गर खर्च ज़्यादा हो जाये तो घर के सदस्यों से मैं फिर अपने कुछ अल्फ़ाज़ बयाँ किया करता हूँ ,

और जिसकी रागों में बस जाएं दूरियाँ ,
उन दूरियों से मैं अकेले में बात किया करता हूँ ,

आज भी मैं जब जब परेशान स कुछ होता हूँ ,
बेफिक्र होकर मैं अपने घर को याद किया करता हूँ ।

जुपिटर शायराना
(सारांश द्विवेदी )
@competition

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