Empathy(सहानुभूति)...।

जो पहले मुझे अपने से लगते थे,
उनका साथ अब सपना सा लगता है ।
दोस्तों की नज़रंदाज़ी कुछ यूँ काम कर गई,
अब हर रिश्ता फितना सा लगता है ।

  • शाहीर रफ़ी

कभी - कभी हमें ज़िंदगी कुछ ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है ,जहाँ न कोई सानी होता है, न साया । बस तन्हाई और अकेलापन ही वफ़ादार साबित होतें हैं । Girlfriend जब दिल तोड़ती है तो बुरा नहीं लगता ,लेकिन जब अपना/अपनी यार/ दोस्त अगर नज़रंदाज़ कर जाए ,वह बात दिल में सुईं की तरह चुभती है ।अब सवाल यह खड़ा होता है ,के इस चीज़ के लिए किसे दोषी ठहराया जाए । क़िस्मत एक ऐसे संदेहात्मक स्तिथि में लाकर छोड़ देती है ,जहाँ हम असहाय होते हैं । किस पर दोष लगाएं ,किस को दिल का हाल सुनाए ।हमें ऐसे एक समाज की ज़रुरत है ,जहाँ लोग “sympathy” देने के बजाए “empathy” दें तो जीवन ख़ुशहाल हो सकता है । गैर को सवेंदना देने से उसका दुःख नहीं कम होगा ,हमें उसके दुःख को महसूस करना पड़ेगा ,जिसको अंग्रेजी में “empathy” कहते हैं ,जो की इंसानियत(humanism) की नींव है ।यही संदेश इन चार पंक्तियों में है । धन्यवाद ।

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