Dil wali Diwali

अबकि दीवाली को रंगीन बनातेहैं ।
चलो खुशियां बाँट के आते हैं ।

वो जो मेरी आँगन की ख़ुशी के लिए अपने आँगन को छोड़ के आते हैं ।

क्यों ना इस बार हम ।

उनके आँगन में पहले से पहुँच जाते हैं ।
दिया , मिठाई , फुलझड़ी , पटाके उनके संग खाते और जलाते हैं ।

उनके और अपने बीच की दीवार को भूल कर , सभी दरारों को मिटाते हैं ।

जिनपर रोज़ मालिक होने का धौस जमाते हैं ।
उनकों आज खुशियों का ठेकेदार का बनाते हैं ।
इसबार
दीवाली बचपन सी मानते हैं ।
सबके गले लगते हैं उनको भी अपने होने का एहसास दिलाते हैं।

चलो फिर से रंगीन खुशियां उनके हक़दारों में बाँट के आते हैं

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