Chapter three (Unka agla sawal )

Question

दरख़्त को,
शाख को,

रोशनदानों को,
चिराग़ को

तेरी ग़िज़ा को
क़रीब से गुज़ारने वाली फ़िज़ा को
दिन भर झूठी तसल्ली दे के चुप कराती हूँ।

पर शब होते ही हर आहट पर
दरवाज़े पर इस्तकबाल के लिए पहुँच जाती हूँ ।

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