Chaand ae hasiin

जो मेहबूब सामने हो, पर साथ ना हो
जो साथ हो, लेकिन बात ना हो

किस काम की फ़िर वो अधूरी सी मोहब्बत,
कि आसमान मै चाँद तो पूरा हो, लेकिन चान्दनी रात ना हो…

है लगता कभी, जैसे ग्रेहन्ड लगा गया है वो,
मेरे ख्वाब से इश्क़ पे पर्दा गिरा गया है वो,
मस्सर अब तो खयाल मै भी,
मेरी दिललगी के हालात ना हो,

के आसमान मै चाँद तो पूरा हो
लेकिन चान्दनी रात ना हो…

हाँ, मेरी मोहब्ब्त का वक़्त ही गलत है,
इश्क़ की ये हरकत ही गलत है
क्या ज़रुरत ऐसे रिश्ते की,
जिसमे मिलके भी हम कभी साथ ना हो,

की आसमान मै चाँद तो पूरा हो,
लेकिन चान्दनी रात ना हो…

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Amazing