सबक़ ( bribe for life )

कुछ सबक को समझने में जो ज़रा सी देर हो गई।
उन्हीं लम्हों की वजह से ज़िन्दगी में अंधेर हो गई।

सही और ग़लत के फ़ैसले में जिन्होंने पैसों को चुना ।
बस उसी वक़्त से इन्सानियत उनसे ग़ैर हो गई

मुख्तलिफ सोच से मेरी नए नए शहरों की सैर हो गई ।
जो पसंद थी सबको वो आदतें भी अब ज़हर हो गई।

दूसरों की ग़ैरत को जगाने की कोशिश में ।
पता ही नहीं चला कब मेरी बातें बेग़ैरत बे उसूल हो गई ।

मेरे चंद झूट और फरेब की तस्वीरे हद से ज़्यादा ज़लील हो गई।
और जो बड़े बड़े धोकेबाज़ थे उनकी गलतियां रिवायतों में शामिल हो गई ।

गुनाहगार तो हम सब हैं किसी ना किसी की नज़र में ,
पर उसके माफ करने से मेरे गुनाह ,सवाबो में तब्दील हो गये

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