" Accidental रोज़ेदार " ...।

यह बात उन दिनों की है ,जब मैं ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ रहा था । रमज़ान का महीना चल रहा था । और गर्मी का मौसम ।कॉलेज जाने की वजह से मैं, रोज़े रख नहीं पाता था । क्योंकि कॉलेज काफ़ी दूर था और ऊपर से भीषण गर्मी भी थी। लेकिन सुबह का नाश्ता घर से ही कर के जाता था । और एक दिन पता नहीं क्यों मैं सुबह बिना ,नाश्ता किए ही कॉलेज के लिए रवाना हो गया ।उस दिन भूख़ के मारे मेरी जान निकली जा रही थी । “practical classes " करने के बाद, भाई हालत पतली हो जाती थी । और उस दिन मुझे भूख़ बहुत जोरों की लगी थी ,तो सोचा की कॉलेज कैंटीन से कुछ खा लूँ ।लेकिन मुक़द्दर का खेल देखिए, वह भी बंद थी । तो मेरे कुछ दोस्तों ने मुझे कहा कि चलो " Cafe " चलतें हैं ।मैंने आश्चर्य चकित होकर पूछा की -” Cafe",वह क्या होता है ?" । तो मेरी खिल्ली उड़ाते हुए, वे नौजवान बोले की तुम किस दुनिया में रहते हो ,इतना भी नहीं पता ।ख़ैर ,चलो हम तुम्हे वहाँ ले चलते हैं ।उस दिन पहली बार मैंने “Cafe” शब्द को सुना था । आख़िर सड़कों और ढाबों में meal खाने वाला व्यक्ति ,क्या जाने cafe क्या होता है ।
वह अमीर घराने के लड़के जो , इत्तेफाक़ से मेरे दोस्त बन गए थे । मुझे उस दिन एक महंगे " Cafe" की तरफ़ आमंत्रित करने लगे । मैं उत्साहित था ,इसीलिए मना नहीं कर पाया ।और वे अपनी बेशकीमती बाइक पर सवार हो कर ,वहाँ के लिए रवाना हो गए ।क्या कहें जनाब बाप के पैसे उड़ाया करते थे ,और अपनी दक्षता का नकारात्मक प्रमाण भी दिया करते थे । ख़ैर मैंने जोश में आकर उनका आमंत्रण तो स्वीकार कर लिया ,परंतु जब जेब में हाथ डाला तो ,50 रूपए की एक नोट जीर्ण - शीर्ण अवस्था में पाई । यह तो बड़ी दिक़्क़त हो गई थी साहब ,आखिर 50 रूपए की क्या औकात थी ,इतने महंगे cafe में ।तो मैंने बहुत सोचने के बाद एक तरकीब निकाली । उनके दिल को ठेस न पहुंचे ,इसिलए मैंने सोचा के चलते हैं ,कुछ बहाना बना लेंगे । खाना ज़रूरी थोड़ी है । लेकिन असल बात यह है ,की मुझे भूख़ लगी थी । बहरहाल, मैं अपने Zeus पुत्र नामक cycle यानी - " Hercules" पर सवार हो कर उनके पीछे - पीछे चल दिया । " Cafe " पहुंचा और चुप चाप उनके साथ विराजमान हो गया । उन्होंने बड़े - बड़े order किए और मैं खामोश सा अफ़साना बन उनकी फ़िज़ूलख़र्ची का एकलौता गवाह बनता गया । मैंने उससे पहले कभी भी cafe की देहलीज़ पर दस्तक नहीं दिया था और मेरी आर्थिक स्थिति मुझे यह करने की मंज़ूरी भी नहीं देती थी ।हम तो रोज़ ,खुले आसमान के नीचे नुक्कड़ पर ,आलू दम दहीवड़ा खाने वाले लोग हैं साहब । यह ऐशपरस्ती मुझे हज़म नहीं होती थी । तो सब लोगों ने कुछ न कुछ आर्डर किया । और मुझसे जब पूछा गया तो ,मेरे तो पसीनें ही छूटने लगे । क्या करें इज़्ज़त का सवाल था ,समाज का ख़याल था ,बड़ी ही दुविधा थी । उस वक़्त कैसी असमंजस की स्थिति थी ,मत पूछिए ।मैं काफ़ी शर्मिंदा महसूस कर रहा था । और भला ठन - ठन गोपाल छपन भोग का तालिब थोड़ी न होगा । तो उस वक़्त में phone का बहाना कर बाहर आगया और ईश्वर से दृढ़ निष्ठा के साथ प्रार्थना करने लगा कि, कैसे भी कर के मेरी reputation बिगड़ने से बचालो । तब शाम के 6 बज रहे थे । और मैं अंदर जा के क्या बोलूंगा ,इससे चिंताग्रस्त था ।तभी अचानक पास के किसी मस्ज़िद से अज़ान की आवाज़ आ रही थी । और मुझे ख़ुदा का इशारा समझ में आगया । मैं अंदर गया ,और यह कह दिया के मैं रोज़े में हूँ ।तो खाना नहीं खा सकता ।और वाकई में उस दिन अनजाने में ही ,सही मैं ,6 बजे तक भूखा ही था । उस दिन शायद कुदरत यही चाहता था , की मैं रोज़ा रखूं ।उस दिन एक रोज़े ने ही मेरी आबरू की हिफाज़त की थी । बस इतनी सी थी यह कहानी ।

Written by - शाहीर रफ़ी ।

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